हाल ही में मणिपुर में दो समुदायों मुख्य रूप से वैष्णव मैतेई और ईसाई कुकी समुदाय के बीच मैतेई को दिए गए एसटी आरक्षण के मुद्दे पर हिंसा छिड़ गई। दो समुदायों के बीच संघर्ष को मीडिया ने एक जातीय संघर्ष, जनजातीय संघर्ष, या आरक्षण के कारण उत्पन्न हुए संघर्ष के रूप में पेश किया।
लेकिन इन सब के बीच जो गायब है वह है संघर्ष को भड़काने और हिंदू बहुसंख्यक भूमि को युद्ध क्षेत्र में परिवर्तित करने में चर्च की भूमिका ताकि हिंदुओं को विस्थापित किया जा सके और इस क्षेत्र में ईसाइयों का प्रभुत्व हासिल हो सके। हाल के दंगे, लूटपाट और हिंदू मंदिरों पर हमले इस तथ्य को उजागर करते हैं कि संघर्ष जातीय या आदिवासियों के बीच नहीं बल्कि हिंदुओं के खिलाफ एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। यह तरीका ठीक वैसा ही है जैसा विभिन्न देशों में इस्लामिक संगठन, बहुसंख्यक आबादी को घुटनों के बल गिराने के लिए लागू करते हैं।
मणिपुर में हाल ही में कुकी- मैतेई समुदाय के बीच के संघर्ष ने हिंसा का स्वरूप ले लिया। इस विवाद की शुरुवात 19 अप्रैल 2023 को हुई जब मणिपुर उच्च न्यायालय की खंडपीठ में कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश एमवी मुरलीदारन ने केंद्र और राज्य सरकार को मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल करने के लिए विचार करने को कहा। कुकी समाज को इस बात का डर था कि इससे आदिवासी क्षेत्रों में भूमि की पहुँच सहित मैतेई समाज को अधिक अधिकार और विशेषाधिकार मिलेंगे, जबकि यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजातियों में डालने का कोई निर्णय नहीं सुनाया था, बल्कि इस संवेदनशील मामले में न्यायालय ने बस केंद्र और राज्य सरकार को विचार करने को कहा था।
वर्तमान में, नागा और कुकी-ज़ोमी जनजातियों की 34 उप-जनजातियाँ सरकार की अनुसूचित जनजातियों की सूची में हैं, लेकिन हिन्दू मैतेई समुदाय इस सूची में नहीं हैं। हालांकि, मैतेई लंबे समय से अनुसूचित जनजाति के दर्जे की मांग कर रहे हैं जिनके पीछे उनका तर्क है कि मणिपुर को बाहरी लोगों की “घुसपैठ” से बचाने की जरूरत है। गौरतलब है कि मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने स्वयं अपने एक बयान में कहा है कि पड़ोसी देश म्यांमार में संघर्ष के कारण के 2,000 से अधिक म्यांमार के नागरिक राज्य में प्रवेश कर गए हैं। अब यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि यह केवल साधारण घुसपैठ है या फिर इस हिंसा को वृहद रूप देने के लिए म्यांमार से घुसपैठ कराए गए थे।
27 अप्रैल को चुराचंदपुर जिले में हिंसा का पहला दौर शुरु हुआ। उसके उपरांत छूट-फूट घटना लगातार होती रही जिसमें मंदिरों को तोड़ना, घरों को जलाना और लूटपाट को अंजाम देना आम रहा। 3 मई को इस हिंसा ने बड़ा रूप लिया जब ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन मणिपुर (एटीएसयूएम) ने मणिपुर उच्च न्यायालय के आदेश का विरोध करते हुए सभी जिलों में एकजुटता मार्च आयोजित किया और देखते ही देखते पूरा मणिपुर जलने लगा। उसी दिन कुकी आदिवासियों की भीड़ ने आयकर विभाग के अधिकारी लेमिनथंग हाओकिप पर इंफाल शहर में हमला कर दिया। उस हमले में कुकी समुदाय के लोगों ने अधिकारी की हत्या कर दी। इसके पश्चात क्रिश्चियन कुकी समुदाय के लोगों ने मणिपुर में व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया और हत्या के लिए हिन्दू मैतेई समुदाय को जिम्मेदार ठहराया। कुकी समुदाय का यह विरोध हिंसक हो गया, और कुकी ईसाईयों ने पूरे मणिपुर में आगजनी, लूटपाट और झड़पों को अंजाम दिया। इस हिंसा में हजारों मैतेई समुदाय के लोगों को अपने घरों से भागने के लिए मजबूर कर दिया गया। मैतेई समुदाय के लोगों के घरों और कारोबार जला दिए गए। हिंसा का मणिपुर की अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। अगर हम स्थानीय लोगों की मानें तो कुकी समुदाय और वैष्णव मैतेई समाज के इस हिंसा में कुकी समुदाय द्वारा लगभग 40 गाँव और शहरों को जलाया गया है जिसमें सबसे ज्यादा क्षति चुराचंदपुर जिले में हुई है। इस हिंसा में वैष्णव मैतेई समुदाय के 3,186 से घर जल कर खाख हो गए और 20,950 परिवार या तो बेघर हो गए या उन्हें किसी सुरक्षित स्थान पर स्थानानत्रित किया गया। इस घटना में 11 मंदिरों को भी तोड़ा गया और लगभग 475 मैतेई समाज के दुकानों को लूटा गया। भारतीय सरकार ने हिंसा को नियंत्रित करने के लिए मणिपुर में सैनिकों को तैनात किया। हालाँकि, आजादी के बाद से ही कुकी समुदाय हमेशा संघर्षों में लिप्त रहा है। उन्होंने उत्तर-पूर्व क्षेत्र में कभी भी शांति स्थापित नहीं की है।
हिंसा के प्रारूप को देखें तो हालिया संघर्ष चर्च सहित भारत विरोधी भावनाओं द्वारा हिंदुओं के खिलाफ एक योजनाबद्ध नीति का हिस्सा लगता है। ऐसा लगता है कि यह हिंसा मैतेई समुदाय पर एक पूर्व नियोजित योजना का हिस्सा था जहाँ उन्होंने हिंदू समुदाय को निशाना बनाया और ईसाइयों के वर्चस्व को दिखाने की कोशिश की। यह इस्लामिक संगठनों, कम्युनिस्टों और चर्च के प्रचारकों का एक संयुक्त गठजोड़ था, जिन्होंने भारत के G20 अध्यकता और आने वाले शिखर सम्मेलन के बीच भारत में गड़बड़ी पैदा करने की कोशिश की। इस हिंसा ने रणनीति और कार्यनीति में समानता के साथ-साथ चर्च(ईसाइयों)-कट्टरवादी इस्लामिक संगठनों और माओवादी के सामरिक गठजोड़ का भी पर्दाफाश किया है।
कुकी-मैतेई संघर्ष 19वीं सदी का पुराना है। कुकी और मैतेई समुदाय दोनों अखंड भारत के हिंदू सांस्कृतिक और धार्मिक क्षेत्र का हिस्सा थे, जिसने इस क्षेत्र के इतिहास और संस्कृति को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया है। मणिपुर राज्य कभी कांगलीपाक के एक वृहद हिंदू साम्राज्य का हिस्सा था, जिसके ऊपर तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर 19वीं शताब्दी में अंग्रेजों के आने से पहले तक विभिन्न हिंदू राजवंशों का शासन था।
हालाँकि, ईसाई धर्म के आगमन और पश्चिमी शिक्षा के प्रसार के साथ, अधिकांश कुकी समुदाय के लोग ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए या अंग्रेजों द्वारा लोभ या प्रलोभन देकर जबरन उनका धर्म परिवर्तन करा दिया गया, जिससे दोनों समुदायों के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक विभाजन हो गया।
कुकी समुदाय इस क्षेत्र में आजादी के बाद से ही विभिन्न संघर्षों में शामिल रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप उत्तर-पूर्व क्षेत्र में अशांति बनी हुई है। 1990 के दशक की शुरुआत में, भारत से मणिपुर को अलग करके एक अलग कुकी देश बनाने के उद्देश्य से कुकी नेशनल फ्रंट (केएनएफ) का गठन किया गया था। केएनएफ ने भारत सरकार के खिलाफ एक हिंसक विद्रोह शुरू किया और इस क्षेत्र में अन्य जातीय समूहों, विशेष रूप से नागा और मैतेई के साथ संघर्ष किया। केएनएफ को कई ईसाई संगठनों और चर्चों से समर्थन मिला, और चर्च संगठनों ने इसे कुकियों के बीच ईसाई धर्म को बढ़ावा देने के अवसर के रूप में देखा। दूसरी ओर, राष्ट्रवादी मैतेई समूहों को केएनएफ द्वारा धमकी दी जाने लगी और कुकी केएनएफ ने मणिपुर में मैतेई समुदाय के छोटे गांवों को निशाना बनाया। दो समुदायों के बीच जैसे जैसे हिंसा बढ़ते गई, चर्च का हस्तक्षेप कुकी समाज की ओर से बढ़ता गया। वे कुकी समुदाय के प्रवक्ता के रूप में मामले मे संलग्न होते चले गए और इस संघर्ष में उलझते चले गए। यहाँ तक कि कुछ ईसाई नेताओं ने खुले तौर पर संघर्ष में केएनएफ का समर्थन किया। चर्च के संघर्ष में शामिल होने के साथ ही दोनों समुदायों का ध्रुवीकरण हो गया और वे धार्मिक आधार पर बंट गए। कुकी जो ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए थे, उन्होंने अन्य ईसाई कुकीज़ के साथ एकजुटता की भावना महसूस की, जबकि मैतेई ने ईसाई धर्म को अपनी सांस्कृतिक पहचान के लिए खतरे के रूप में देखा। चर्च की भागीदारी ने धार्मिक आधार पर दो समुदायों के ध्रुवीकरण को भी जन्म दिया, जिसने संघर्ष को और बढ़ा दिया। दोनों समुदाय भूमि और संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, और अतीत में उनके बीच हिंसा के कई प्रकोप हुए हैं। नवीनतम हिंसा मणिपुर में शांति की कमजोरी और सरकार के लिए संघर्ष के बुनियादी कारणों से निपटने की जरूरत की याद दिलाती है।
हिंदू वैष्णव मेइती समुदाय पर हमलों के पीछे भारत विरोधी षडयंत्र :
हथियारों की तस्करी:– बार बार ऐसा देखा जा रहा है कि जब भी इस क्षेत्र में हिंसा हो रही है तो हिंसे में बाहरी लोग शामिल रहे हैं और क्षेत्र को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं। बाहरी लोगों को हथियारों की तस्करी के व्यापार में कुकी ईसाइयों ने मदद की, जिसने संघर्ष को बढ़ाने में योगदान दिया। माना जाता है कि कुकी द्वारा इस्तेमाल किए गए कुछ हथियार भारत के बाहर से मंगाए गए थे।
घुसपैठ:– इस संघर्ष के परिणामस्वरूप हजारों हिंदू मैतेई समुदाय को विस्थापन करना पड़ा, जिनमें से कई ने असम और नागालैंड जैसे पड़ोसी राज्यों में शरण मांगी। साथ ही, स्थानीय लोगों द्वारा यह भी देखा गया है कि म्यांमार के कई घुसपैठिए ने भारतीय सीमा में घुसपैठ की और मणिपुर में हिंसा को उकसाया।
राजनीतिक हस्तक्षेप:– बाहरी लोग विशेष रूप से इसाई मिशनरी इस क्षेत्र के आन्तरिक मामलों में खाश कर विभिन्न कुकी ईसाइयों के लिए धन और समर्थन के रूप में शामिल रहे जिसने संघर्ष को और बढ़ा दिया है और शांतिपूर्ण समाधान ढूंढना ज्यादा कठिन बना दिया है।
मीडिया कवरेज:– कैथेलिक ईसाइयों और चर्चों ने इस हिंसा को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पहले उन्होंने कुकी ईसाइयों की भीड़ को भड़काकर संघर्ष को बढ़ाया और फिर मीडिया कवरेज और सोशल मीडिया के माध्यम से उनका समर्थन किया। पश्चिमी कैथोलिक-प्रभुत्व वाले मीडिया आउटलेट्स ने संघर्ष को पक्षपाती या सनसनीखेज तरीके से चित्रित किया है जहां उन्होंने कुकी ईसाइयों को निर्दोष साबित की पुरजोड़ कोशिश की और मैतेई हिंदू समुदाय को हमलावर साबित किया जिससे एक शांतिपूर्ण समाधान खोजना अधिक कठिन हो गया है।
मणिपुर में कुकी-मैतेई संघर्ष में ईसाइयों और चर्चों (बाहरी लोगों) की भागीदारी ने इस मुद्दे की जटिलता को बढ़ाने में काफी बड़ा योगदान दिया है और एक स्थायी समाधान खोजने के लिए इसे और अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है। यह देखा गया है कि उत्तर-पूर्व में नशीले पदार्थों की खपत में तेजी से वृद्धि हुई है। चर्च युवाओं को नशे का आदी बनाता है और अच्छा मुनाफा कमाता है। एक बार जब युवा इसके आदी हो जाते हैं, तो चर्च इन युवाओं को अपने लाभ और आवश्यकता के अनुसार उपयोग में लाता है।
यहाँ गौर करने वाली बात यह भी है कि जिस तरह से इस हिंसा में कुकी समाज को बाहर से विशेष रूप से केरेला के कट्टरपंथी विचारधारा वाले वामपंथी संगठनों से, पश्चिमी मीडिया आउटलेट्स से और ईसाइयों और चर्चों से जो समर्थन प्राप्त हुआ है, उससे कहीं ना कहीं मैतेई समुदाय में असंतोष की भावना उत्पन्न होती है।
इन दोनों समूहों के बीच विश्वास पैदा करना एक महत्वपूर्ण कदम है। यह आर्थिक विकास और शिक्षा जैसे साझा हितों पर संवाद और सहयोग के माध्यम से किया जा सकता है। भूमि विवाद और भेदभाव जैसे संघर्ष के मूल कारणों को दूर करना भी महत्वपूर्ण है।
लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि मणिपुर में कई स्थानों पर हिंसा की छिटफुट घटनाएं होती रहती हैं, जो एक दीर्घकालिक समाधान की आवश्यकता पर प्रकाश डालती हैं। ऐसे में सवाल बस इतना है कि ऐसे संस्थान जो भारत जो भारत की अखंडता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करते हैं क्या भारत से बाहर निकाल दिया जाना चाहिए?
लेखक के बारे में :- लेखक आदर्श कुमार झा वर्तमान में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र हैं और वह ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय द्विपक्षीय संबंधों और घरेलू मुद्दों के बारे में लिखते हैं।
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